एक दिव्यता थी आज के क्षितिज पर
अद्भुत आभा भी थी आज गगन में
जो दिखा मुझे शायद तुम्हे न दिखे
आज आसमां में रंगीन शमियाना नज़र आ रहे हैं
और उसमे वही अपना चाँद ,
जिसमे रंगोली बने हैं
बीचो बीच लगे झूमर में सिल सा गया है
सितारे भी कम नहीं
सारे उसके सहबाला बने हैं
बाहर की काली मिट्टी
और अन्दर के कपूर बाती से
उपजी है एक सूफ़ी हवा
जो तुम्हारी रूह में सिमटी जा रही है
समां ऐसा बंधे तो नभ में हलचल
नक्षत्रों ने भी अपने अपने रंगों को मिलाया
नीली गठरियों में लाल सूर्ख प्रेम रंग भर
पियरी वाली रस्सी से बांध
अपने टीनएज वाले सूरज से भिजवा दिया
बस तुम्हारे लिए
रात से पहले उसे तो जाना ही था
वही पीली गुलाब और लाल ऊरहुल के बीच
बादाम के ठूठों और बच्चे पपीते के पौध साथ
उन गठरियों को रख छोड़ा है


